नक्शा न () आज अनन- ३. यायावरका अर्थ है सदा विचरनेवाला मुनि। मुनिवृत्तिसे रहते हुए सदा इधर-उधर घूमते रहनेवाले गृहस्थ ब्राह्मणोंक एक समूहविशेषकी यायावर संज्ञा है। ये लोग एक गाँवमें एक रातसे अधिक नहीं ठहरते और पक्षमें एक बार अन्निहोत्र करते हैं। पक्षहोम सम्प्रदायकी प्रवृत्ति इन्हींसे हुई है। इनके विषयमें भारद्वाजका वचन इस प्रकार मिलता है-- यायावरा नाम ब्राह्मणा आसंस्ते अर्धमासादग्निहोत्रमजुह्नन् । यायावरलोग घूमते-घूमते जहाँ संध्या हो जाती है वहीं ठहर जाते हैं। २. यहाँ भूलोक ही गड्ढा है। स्वर्गवासी पितरोंको जो नीचे गिरनेका भय लगा रहता है उसीको सूचित करनेके लिये यह कहा गया है कि उनके पैर ऊपर थे और सिर नीचे। काल ही चूहा है और वंशपरम्परा ही वीरणस्तम्ब (खस नामक तिनकोंका समुदाय) है। उस वंशमें केवल जरत्कारु बच गये थे और अन्य सब पुरुष कालके अधीन हो चुके थे। यही व्यक्त करनेके लिये चूहेके द्वारा तिनकोंके समुदायको सब ओरसे खाया हुआ बताया गया है। जरत्कारुके विवाह न करनेसे उस वंशका वह शेष अंश भी नष्ट होना चाहता था। इसीलिये पितर व्याकुल थे और जरत्कारुको इसका बोध करानेके लिये उन्होंने इस प्रकार दर्शन दिया था। चतुर्दशो 5 ध्याय: जरत्कारुद्वारा वासुकिकी बहिनका पाणिग्रहण सौतिरुवाच ततो निवेशाय तदा स वि्र: संशितव्रत: । महीं चचार दारार्थी न च दारानविन्दत,उग्रश्रवाजी कहते हैं--तदनन्तर वे कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मण भार्याकी प्राप्तिके लिये इच्छुक होकर पृथ्वीपर सब ओर विचरने लगे; किंतु उन्हें पत्नीकी उपलब्धि नहीं हुई
sautir uvāca | tato niveśāya tadā sa vipraḥ saṁśitavrataḥ | mahīṁ cacāra dārārthī na ca dārān avindata ||
Sauti nói: Sau đó, vị Bà-la-môn ấy—kiên định trong những lời thệ nguyện khổ hạnh—lang thang khắp cõi đất để tìm vợ, nhưng vẫn không có được phối ngẫu. Câu kệ nêu bật sự căng thẳng giữa sự tự chế của đời tu khổ hạnh và nhu cầu theo dharma của đời sống gia thất nhằm duy trì dòng tộc và hoàn thành bổn phận đối với tổ tiên.
शौनक उवाच
Even a disciplined ascetic may be drawn into household obligations when dharma requires sustaining lineage and discharging duties connected with family and ancestors; personal austerity alone does not exhaust one’s responsibilities.
After earlier events that press upon him the need for marriage, the brāhmaṇa (Jaratkāru) roams the earth in search of a suitable wife, but he does not succeed at this stage.