वयस्यत्वात् तु ते ब्रह्मन्नपराधमिमं क्षमे । नेदृशं तु पुनर्वाच्यं यदि जीवितुमिच्छसि,“क्या कहना चाहिये और क्या नहीं, इसका तुझे ज्ञान नहीं है। निश्चय ही तू अपनी बातोंसे मेरा अपमान कर रहा है। भला, मेरा पुत्र भीष्म-द्रोण आदि समस्त वीरोंको क्यों नहीं जीत लेगा? ब्रह्मन! मित्र होनेके नाते ही मैं तुम्हारे इस अपराधको क्षमा करता हूँ। यदि जीनेकी इच्छा हो, तो फिर ऐसी बात न करना”
vayasyatvāt tu te brahmann aparādham imaṁ kṣame | nedṛśaṁ tu punar vācyaṁ yadi jīvitum icchasi ||
“اے برہمن! ہماری دیرینہ دوستی کے سبب میں اس قصور کو معاف کرتا ہوں؛ مگر اگر جینا چاہتے ہو تو ایسی بات پھر کبھی نہ کہنا۔”
वैशम्पायन उवाच