Adhyāya 6: Kaṅka (Yudhiṣṭhira) Seeks Refuge in Virāṭa’s Assembly
ध्वजेन शिखिपिच्छानामुच्छ़ितेन विराजसे । कौमारं व्रतमास्थाय त्रिदिवं पावितं त्वया,“तुम्हारी मयूरपिच्छसे चिह्नित ध्वजा आकाशमें ऊँची फहरा रही है। उससे तुम्हारी शोभा और भी बढ़ गयी है। तुमने ब्रह्मचर्यव्रत धारण करके तीनों लोकोंको पवित्र कर दिया है
مورپَر کے نشان والی بلند دھوج کے ساتھ تو جگمگا رہی ہے۔ کُوماریہ (برہماچریہ) کا ورت اختیار کرکے تو نے تریدِو کو پاک کر دیا ہے۔
वैशम्पायन उवाच