Aśvatthāman’s Admonition to Karṇa on Boasting, Varṇa-Duties, and the Threat of Arjuna
Virāṭa-parva, Adhyāya 45
एवं युक्ताड्ररूपस्य लक्षणै: सूचितस्य च । केन कर्मविपाकेन क्लीबत्वमिदमागतम्,(वह चिन्ता इस प्रकार है--) आपका एक-एक अवयव तथा रूप सब प्रकारसे उपयुक्त है। आप लक्षणोंद्वारा भी अलौकिक सूचित हो रहे हैं। ऐसी दशामें भी किस कर्मके परिणामसे आपको यह नपुंसकता प्राप्त हुई है?
آپ کے اعضا و صورت ہر طرح سے موزوں ہیں، اور علامات سے بھی آپ کی فوق البشر حیثیت ظاہر ہوتی ہے۔ پھر کس عمل کے انجام (کرم وِپاک) سے آپ پر یہ مخنث پن آیا؟
उत्तर उवाच