द्रौपद्याः शोकवचनम्
Draupadī’s Lament and Indictment of Misfortune
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ९२ श्लोक मिलाकर कुल १४३ श्लोक हैं।) हि आय न () ऑन अप सप्तदशो< ध्याय: ट्रौोपदीका भीमसेनके समीप जाना वैशम्पायन उवाच सा हता सूतपुत्रेण राजपत्नी यशस्विनी । वधं कृष्णा परीप्सन्ती सेनावाहस्य भामिनी,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! सूतपुत्र सेनापति कीचकने जबसे लात मारी थी, तभीसे यशस्विनी राजपत्नी भामिनी द्रौपदी उसके वधकी बात सोचने लगी इस प्रकार श्रीमह्या भारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदी- भीम-संवादविषयक सत्रहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १७ ॥। अऑडआ नतर (0) है - नकुल-सहदेव जुड़वें पैदा हुए थे; अतः वे दोनों कनिष्ठ (छोटे) भाई हैं। युधिष्ठिर बड़े हैं। भीमसेन और अर्जुन मध्यम हैं। विराटपर्वके प्रसंगमें अर्जुन पुरुष नहीं रह गये हैं। अतः भीमसेन ही यहाँ प्रधानरूपसे मध्यम पाण्डव कहे गये हैं। अष्टादशोड ध्याय: द्रौोपदीका भीमसेनके प्रति अपने दुःखके उद्बार प्रकट करना वैशम्पायन उवाच (सा लज्जमाना भीता च अधोमुखमुखी तत: । नोवाच किंचिद् वचन बाष्पदूषितलोचना ।। वैशम्पायनजी कहते हैं-जनमेजय! उस समय लज्जित और भयभीत हुई द्रौपदीके नेत्रोंमें आँसू भर आये थे। वह मुह नीचा किये मौन बैठी रही; कुछ भी बोल न सकी। अथाब्रवीद् भीमपराक्रमो बली वृकोदर: पाण्डवमुख्यसम्मतः । प्रत्रूहि कि ते करवाणि सुन्दरि प्रियं प्रिये वारणखेलगामिनि ।।) तब पाण्डवप्रवर युधिष्ठिरके परम प्रिय भयंकर पराक्रमी महाबली भीम इस प्रकार बोले --'सुन्दरि! गजराजकी भाँति लीला-विलासपूर्वक मन्द-गतिसे चलनेवाली प्रिये! बताओ; मैं तुम्हारा कौन-सा प्रिय कार्य करूँ?'। द्रौपहुुवाच अशोच्यत्वं कुतस्तस्य यस्या भर्ता युधिष्ठिर: । जानन् सर्वाणि दुःखानि किं मां त्वं परिपृच्छसि
vaiśampāyana uvāca | sā hatā sūtaputreṇa rājapatnī yaśasvinī | vadhaṃ kṛṣṇā parīpsantī senāvāhasya bhāminī ||
وَیشَمپایَن نے کہا—اے راجن! جب سوت پُتر سپہ سالار کیچک نے اس نامور ملکہ کرشنا (دروپدی) کو لات ماری، تبھی سے بھامنی دروپدی اس کے وध کی خواہاں ہو کر دل میں سوچنے لگی۔
वैशम्पायन उवाच
Power used to violate the vulnerable—especially within a king’s domain—creates adharma that must be corrected. Draupadī’s resolve signals that dignity and justice are not optional; restoring moral order may require decisive punishment of the offender.
After being assaulted by Kīcaka, Draupadī (living incognito in Virāṭa’s palace) turns her mind toward arranging his death. This sets up her appeal to Bhīma and the ensuing plan that culminates in Kīcaka’s slaying.