Adhyāya 14: Sudēṣṇā Sends Sairandhrī to Kīcaka’s House (सुदेष्णा–सैरन्ध्री–कीचक संवादः)
प्रविष्टा ह्मसितापाज्धि प्रचण्डाश्षण्डदारुणा: । अत्युन्मादसमारम्भा: प्रीत्युन्मादकरा मम | आत्मप्रदानसम्भोगैर्मामुद्धर्तुमिहाहसि,“चन्द्रमुखी! मेरे मनको उन्मत्त बना देनेवाले कामदेवके बाणसमूह तुम्हारे समागमकी आशारूपी शानपर चढ़कर अत्यन्त तीखे और तीव्र हो गये हैं। कजरारे नयनप्रान्तोंवाली सुन्दरी! अत्यन्त क्रोधपूर्वक चलाये हुए कामके वे प्रचण्ड एवं भयंकर बाण दयाशून्य हो वेगसे आकर मेरे इस हृदयको विदीर्ण करके भीतर घुस गये हैं और अतिशय उन्माद (सन्निपातजनित बेहोशी) पैदा कर रहे हैं। वे मेरे लिये प्रेमोन्मादजनक हो रहे हैं। अब तुम्हीं आत्मदान-जनित सम्भोगरूप औषधके द्वारा यहाँ मेरा उद्धार कर सकती हो
vaiśampāyana uvāca | praviṣṭā hmasitāpājdhi pracaṇḍāśṣaṇḍadāruṇāḥ | aty-unmāda-samārambhāḥ prīty-unmāda-karā mama | ātma-pradāna-sambhogair mām uddhartum ihāhasi |
وہ نہایت شدید، چیر پھاڑ کرنے والے ہولناک تیر میرے دل میں پیوست ہو چکے ہیں؛ وہ جنون کو بھڑکاتے اور میرے اندر عشق کا دیوانہ پن پیدا کرتے ہیں۔ اے ماہ رُخ! خودسپردگی سے پیدا ہونے والے وصل کے ذریعے یہاں مجھے بچانا تمہیں ہی زیب دیتا ہے۔
वैशम्पायन उवाच