Nakula’s Reception in Matsya: Appointment as Aśvasūta
Horse-master
(अर्जुन उवाच वेणीं प्रकुर्या रुचिरे च कुण्डले तथा स्त्रज: प्रावरणानि संहरे । स््नान॑ चरेयं विमृजे च दर्पणं विशेषकेष्वेव च कौशलं मम ।। क्लीबेषु बालेषु जनेषु नर्तने शिक्षाप्रदानेषु च योग्यता मम । करोमि वेणीषु च पुष्पपूरणं न मे स्त्रिय: कर्मणि कौशलाधिका: ।। अर्जुन बोले--मैं वेणी-रचना अच्छी कर सकता हूँ, मनोहर कुण्डल बनाना जानता हूँ, फूलोंके हार तथा ओढ़नेकी चादरें सुन्दर ढंगसे बनाता हूँ, स्नान करा सकता हूँ, दर्पणकी सफाई करता हूँ और चन्दन आदिसे अनेक प्रकारकी रेखाएँ बनाकर शृंगार करनेकी क्रियामें मुझे विशेष कुशलता प्राप्त है। नपुंसकों, बालकों एवं साधारण लोगोंमें नाचने तथा संगीत एवं नृत्यकी शिक्षा देनेमें मेरी अच्छी योग्यता है। स्त्रियोंकी वेणीमें फ़ूल गूँथनेका कार्य भी मैं अच्छे ढंगसे सम्पन्न करता हूँ। इन सब कार्योमें स्त्रियाँ भी मुझसे अधिक कुशल नहीं हैं। तमब्रवीत् प्रांशुमुदीक्ष्य विस्मितो विराटराजोपसूतं महायशा: ।। निकट आनेपर उसका कद बहुत ऊँचा देखकर महायशस्वी राजा विराट अत्यन्त विस्मित होकर बोले। विराट उवाच नाहस्तु वेषो5यमनूर्जितस्ते नापुंस्त्वम्हों नरदेवसिंह । तवैष वेशो5शुभवेष भूषणै- विभूषितो भूतपतेरिव प्रभो ।। विभाति भानोरिव रश्मिमालिनो घनावरुद्धे गगने घनैरिव । भधनुर्हि मन््ये तव शोभयेद् भुजौ तथा हि पीनावतिमात्रमायतौ ।।) विराटने कहा--नरदेवसिंह! ओज और बलसे रहित नपुंसकका-सा यह वेष तुम्हारे योग्य नहीं है। तुम क्लीब होनेके योग्य नहीं हो। प्रभो! तुम्हारा यह वेष भगवान् भूतनाथकी भाँति अशुभ वेष-भूषासे विभूषित है। जैसे बादलोंकी घटासे आच्छादित आकाशमें भी अंशुमाली सूर्यका मण्डल सुशोभित होता है, उसी प्रकार इस क्लीबवेषमें भी तुम पौरुषसे प्रकाशित हो रहे हो। मेरा ऐसा विश्वास है कि तुम्हारी इन मोटी और अत्यन्त विशाल भुजाओंको धनुष ही सुशोभित कर सकता है। अजुन उवाच गायामि नृत्याम्यथ वादयामि भद्रो$स्मि नृत्ये कुशलो5स्मि गीते । त्वमुत्तरायै प्रदिशस्व मां स्वयं भवामि देव्या नरदेव नर्तक:,अर्जुनने कहा--नरदेव! मैं गाता, नाचता और बाजे बजाता हूँ। नृत्यकलामें निपुण और संगीत-कलामें भी कुशल हूँ। आप उत्तराको शिक्षा देनेके लिये मुझे रख लें। मैं स्वयं राजकुमारी उत्तराको नृत्य सिखलाऊँगा
arjuna uvāca |
veṇīṁ prakuryā rucire ca kuṇḍale tathā srajaḥ prāvaraṇāni saṁhare |
snānaṁ careyaṁ vimṛje ca darpaṇaṁ viśeṣakeṣv eva ca kauśalaṁ mama ||
klībeṣu bāleṣu janeṣu nartane śikṣāpradāneṣu ca yogyatā mama |
karomi veṇīṣu ca puṣpapūraṇaṁ na me striyaḥ karmaṇi kauśalādhikāḥ ||
ارجن نے کہا—“میں زلفوں کی وینی (چوٹی) بنا سکتا ہوں، دلکش کُندل تیار کرنا جانتا ہوں؛ پھولوں کے ہار اور اوڑھنے کے کپڑے بھی سلیقے سے بنا دیتا ہوں۔ غسل میں مدد، آئینہ صاف و چمکانا، اور چندن وغیرہ سے سنگھار کی نقش و نگاری—ان کاموں میں مجھے خاص مہارت ہے۔ خواجہ سراؤں، بچوں اور عام لوگوں کے درمیان ناچنے اور گیت و رقص کی تعلیم دینے کی بھی مجھ میں صلاحیت ہے۔ عورتوں کی چوٹیوں میں پھول گوندھنا بھی میں خوب کر لیتا ہوں؛ ان کاموں میں عورتیں بھی مجھ سے زیادہ ماہر نہیں ہیں۔”
अजुन उवाच
The verse underscores disciplined adaptability in service of dharma: Arjuna restrains his warrior identity and adopts peaceful, socially acceptable skills to uphold the incognito vow and prevent premature violence, showing that true strength includes self-control and strategic humility.
During the Pāṇḍavas’ year of concealment, Arjuna presents himself in Virāṭa’s court as a non-threatening specialist in adornment, music, and dance, positioning himself to be employed as an instructor and thereby maintaining the disguise safely.