अध्याय ८७: कृष्णस्य हस्तिनापुरप्रवेशः
Krishna’s Entry into Hastināpura and Court Reception
ऑपन-आ का बछ। आर: 2 अष्टाशीतितमो<् ध्याय: दुर्योधनका श्रीकृष्णके विषयमें अपने विचार कहना एवं उसकी कुमन्त्रणासे कुपित हो भीष्मजीका सभासे उठ जाना दुर्योधन उवाच यदाह विदुर: कृष्णे सर्व तत् सत्यमच्युते । अनुरक्तो हासंहार्य: पार्थान् प्रति जनार्दन:,दुर्योधन बोला--पिताजी! अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले श्रीकृष्णके सम्बन्धमें विदुरजी जो कुछ कहते हैं, वह सब कुछ ठीक है। जनार्दन श्रीकृष्णका कुन्तीके पुत्रोंके प्रति अटूट अनुराग है; अतः उन्हें उनकी ओरसे फोड़ा नहीं जा सकता
duryodhana uvāca | yad āha viduraḥ kṛṣṇe sarva tat satyam acyute | anurakto hy asaṃhāryaḥ pārthān prati janārdanaḥ ||
دُریودھن بولا—پتا جی! اَچْیُت شری کرشن کے بارے میں وِدُر نے جو کچھ کہا ہے وہ سب سچ ہے۔ جناردن شری کرشن کی پارتھوں (کُنتی پُتروں) کے لیے محبت اٹل اور ناقابلِ توڑ ہے؛ اس لیے انہیں اُن کی طرف سے جدا نہیں کیا جا سکتا۔
दुर्योधन उवाच