यजचध्वं विविधीर्यज्निविप्रेभ्यो दत्त दक्षिणा: । पुत्रैदरिश्ष मोदध्वं महद् वो भयमागतम्,“कौरवो! नाना प्रकारके यज्ञोंका अनुष्ठान आरम्भ करो, ब्राह्मणोंको दक्षिणाएँ दो, पुत्रों और स्त्रियोंसे मिल-जुलकर आनन्द भोग लो; क्योंकि तुम्हारे ऊपर बहुत बड़ा भय आ पहुँचा है
“اے کوروو! طرح طرح کے یَجْن شروع کرو، برہمنوں کو دَکْشِنا دو، بیٹوں اور عورتوں کے ساتھ مل کر خوشی مناؤ؛ کیونکہ تم پر ایک بہت بڑا خوف آ پہنچا ہے۔”
वायुदेव उवाच