Nara-Nārāyaṇa Precedent and Bhīṣma’s Counsel on Kṛṣṇa–Arjuna; Karṇa’s Reply
एतौ हि कर्मणा लोकानश्रुवातेक्षयान् ध्रुवान् | तत्र तत्रैव जायेते युद्धकाले पुन: पुन:,ये दोनों अपने सत्कर्मके प्रभावसे अक्षय एवं ध्रुवलोकोंको व्याप्त करके स्थित हैं। लोकहितके लिये जब-जब जहाँ-जहाँ युद्धका अवसर आता है, तब-तब वहाँ-वहाँ ये बार- बार अवतार ग्रहण करते हैं
یہ دونوں اپنے کرم کے اثر سے اَکشیہ اور دھرو لوکوں میں قائم ہیں۔ عالم کی بھلائی کے لیے جب جب اور جہاں جہاں جنگ کا وقت آتا ہے، تب تب اور وہاں وہاں یہ بار بار ظہور کرتے ہیں۔
वैशम्पायन उवाच