Sanatsujāta on Vedic Learning, Truth (Satya), and the Discipline of Dama–Tyāga–Apramāda
गुरुके प्रति शिष्यका जैसा श्रद्धा और सम्मानपूर्ण बर्ताव हो, वैसा ही गुरुकी पत्नी और पुत्रके साथ भी होना चाहिये। यह भी ब्रह्मचर्यका द्वितीय पाद ही कहलाता है ।। आचार्येणात्मकृतं विजानन् ज्ञात्वा चार्थ भावितोडस्मीत्यनेन | यन्मन्यते त॑ प्रति हृष्टबुद्धिः स वै तृतीयो ब्रह्मचर्यस्य पाद:,आचार्यने जो अपना उपकार किया, उसे ध्यानमें रखकर तथा उससे जो प्रयोजन सिद्ध हुआ, उसका भी विचार करके मन-ही-मन प्रसन्न होकर शिष्य आचार्यके प्रति जो ऐसा भाव रखता है कि इन्होंने मुझे बड़ी उन्नत अवस्थामें पहुँचा दिया--यह ब्रह्मचर्यका तीसरा पाद है
sanatsu-jāta uvāca | ācāryeṇātmakṛtaṁ vijānan jñātvā cārthaṁ bhāvito ’smīty anena | yan manyate taṁ prati hṛṣṭa-buddhiḥ sa vai tṛtīyo brahmacaryasya pādaḥ ||
شاگرد کو استاد کے ساتھ جیسا ادب، عقیدت اور احترام رکھنا چاہیے، ویسا ہی رویہ استاد کی زوجہ اور فرزند کے ساتھ بھی ہونا چاہیے—یہ برہماچریہ کا دوسرا قدم کہلاتا ہے۔ اور استاد نے جو ذاتی احسان کیا ہو اسے جان کر، اور یہ سوچ کر کہ اسی سے مقصد پورا ہوا—دل میں خوش ہو کر یہ خیال رکھنا کہ “اسی نے مجھے پرورش دی اور سنوارا”—استاد کے لیے ایسی شادمان اور شکرگزار کیفیت رکھنا برہماچریہ کا تیسرا قدم ہے۔
सनत्सुजात उवाच