Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
द्वाःस्थ उवाच विदुरो$यमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् | द्रष्टमिच्छति ते पादौ कि करोतु प्रशाधि माम्,द्वारपालने जाकर कहा--महाराज! आपकी आज्ञासे विदुरजी यहाँ आ पहुँचे हैं, वे आपके चरणोंका दर्शन करना चाहते हैं। मुझे आज्ञा दीजिये, उन्हें क्या कार्य बताया जाय?
دربان نے عرض کیا— “مہاراج! آپ کے حکم سے ودور یہاں آ پہنچے ہیں۔ وہ آپ کے قدموں کی زیارت چاہتے ہیں۔ حکم دیجیے، میں کیا کروں؟”
द्वाःस्थ उवाच