Śikhaṇḍinī’s Marriage Arrangement and the Daśārṇa Envoy’s Accusation (शिखण्डिनी-विवाह-विप्रलम्भ-प्रसङ्गः)
ऑपनआक्रात बछ। अं क्ाज एकनवर्त्याधिकशततमो< ध्याय: ट्रुपदपत्नीका उत्तर, द्रुपदके द्वारा नगररक्षाकी व्यवस्था और देवाराधन तथा शिखण्डिनीका वनमें जाकर स्थूणाकर्ण नामक यक्षसे अपने दुःखनिवारणके लिये प्रार्थना करना भीष्म उवाच तत: शिखण्डिनो माता यथातत्त्वं नराधिप । आचचक्षे महाबाहो भरत्रें कन््यां शिखण्डिनीम्,भीष्मजी कहते हैं--महाबाहु नरेश्वर! तब शिखण्डीकी माताने अपने पतिसे यथार्थ रहस्य बताते हुए कहा--“यह पुत्र शिखण्डी नहीं, शिखण्डिनी नामवाली कन्या है
bhīṣma uvāca | tataḥ śikhaṇḍino mātā yathātattvaṃ narādhipa | ācacakṣe mahābāho bhartre kanyāṃ śikhaṇḍinīm ||
بھیشم نے کہا—اے نرادھپ، تب شکھنڈی کی ماں نے حقیقت کو جوں کا توں ظاہر کر دیا۔ اے مہاباہو! اس نے اپنے شوہر سے کہا—“یہ شکھنڈی نام کا بیٹا نہیں؛ یہ شکھنڈِنی نام کی بیٹی ہے۔”
भीष्म उवाच