यस्य धर्मध्वजो नित्यं सुरा ध्वज इवोच्छित: । प्रच्छन्नानि च पापानि बैडालं नाम तद् व्रतम्,“देवताओ! साधारण ध्वजकी भाँति जिसकी धर्ममयी ध्वजा सदा ऊँचेतक फहराती रहती है; परंतु जिसके द्वारा गुप्तरूपसे पाप भी होते रहते हैं, उसके उस व्रतको बिडालव्रत कहते हैं
جس کا دھرم دھوج ہمیشہ دیوتاؤں کے جھنڈے کی طرح بلند رہے، مگر جس کے گناہ پردے میں چھپے رہیں—اس کے اس ورت کو ‘بَیڈال ورت’ کہا جاتا ہے۔
संजय उवाच