Ulūka’s Provocative Envoy-Speech in the Pāṇḍava Camp
Ulūka-dūta-vākya
न होव कर्ता पुरुष: कर्मणो: शुभपापयो: । अस्वतन्त्रो हि पुरुष: कार्यते दारुयन्त्रवत्,क्योंकि मनुष्य पुण्य और पापके फलभोगकी प्रक्रियामें स्वतन्त्र कर्ता नहीं है; क्योंकि मनुष्य प्रारब्धके अधीन है, उसे तो कठपुतलीकी भाँति उस कार्यमें प्रवृत्त होना पड़ता है
انسان نیکی اور بدی کے اعمال کا خودمختار فاعل نہیں؛ انسان آزاد نہیں—وہ اپنے مقدر (پراربدھ) کے تابع لکڑی کے آلے (کٹھ پتلی) کی طرح عمل پر لگا دیا جاتا ہے۔
संजय उवाच