Adhyāya 152: Kaurava-sainyavibhāgaḥ
Division and Standardization of the Kaurava Host
योधचन्द्रोदयोद्धूत: कुरुराजमहार्णव: । व्यदृश्यत तदा राजंश्वन्द्रोदय इवोदधि:,राजन! जैसे चन्द्रोदयकालमें समुद्र उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त हो जाता है, उसी प्रकार कुरुराज दुर्योधनरूपी महासागर सैनिक-समुदायरूपी चन्द्रमाके उदयसे अत्यन्त उललसित दिखायी देने लगा। सब ओर घूमता हुआ जनसमुदाय ही वहाँ जलमें उठनेवाली भँवरोंके समान जान पड़ता था। रथ, हाथी और घोड़े उसमें मछलीके समान प्रतीत होते थे। शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनि ही उस कुरुराजरूपी समुद्रकी गर्जना थी। खजानोंका संग्रह ही रत्नराशिका प्रतिनिधित्व कर रहा था। योद्धाओंके विचित्र आभूषण और कवच ही उस समुद्रकी उठती हुई तरंगोंके समान जान पड़ते थे। चमकीले शस्त्र ही निर्मल फेन-से प्रतीत होते थे। महलोंकी पंक्तियाँ ही तटवर्ती पर्वत-सी जान पड़ती थीं। सड़कोंपर स्थित दूकानें ही मानो गुफाएँ थीं
vaiśampāyana uvāca |
yodhacandrodayoddhūtaḥ kururājamahārṇavaḥ |
vyadṛśyata tadā rājañ chandrodaya ivodadhiḥ ||
اے راجا، اُس وقت جنگجوؤں کے چاند کے طلوع سے برانگیختہ کُرو راجیہ کی صورت والا یہ مہاسَمندر چاند نکلنے کے وقت کے سمندر کی مانند ہی دکھائی دیا۔
वैशम्पायन उवाच