अध्याय १२२ — कृष्णस्य दुर्योधनं प्रति नीत्युपदेशः
Kṛṣṇa’s Ethical Counsel to Duryodhana
जो मनुष्य तुम्हारे स्वर्गसे गिरने और पुनः आरूढ़ होनेके इस वृत्तान्तको आपसमें कहें- सुनेंगे, वे संकटमें पड़नेपर भी उससे पार हो जायँगे; इसमें संशय नहीं है ।। नारद उवाच एष दोषो5भिमानेन पुरा प्राप्तो ययातिना । निर्बध्नतातिमात्रं च गालवेन महीपते,नारदजी कहते हैं--राजन्! इस प्रकार पूर्वकालमें राजा ययाति अपने अभिमानके कारण संकटमें पड़ गये थे और अत्यन्त आग्रह एवं हठके कारण महर्षि गालवको भी महान् क्लेश सहन करना पड़ा था
yo manuṣyas tumhāre svargase girane punaḥ ārūḍha hone ke is vṛttānt ko āpas meṁ kaheṁ-suneṁge, ve saṅkaṭ meṁ paṛane par bhī usse pār ho jāyaṁge; ismeṁ saṁśaya nahīṁ hai. nārada uvāca—eṣa doṣo 'bhimānena purā prāpto yayātinā; nirbadhnatātimātraṁ ca gālavena mahīpate.
نارد نے کہا—جو لوگ تمہارے جنت سے گرنے اور پھر دوبارہ عروج پانے کی اس حکایت کو آپس میں بیان کریں گے اور سنیں گے، وہ آفت میں گھر کر بھی یقیناً اس سے پار نکل جائیں گے؛ اس میں کوئی شک نہیں۔ اے راجن، قدیم زمانے میں یہی عیب غرور کے سبب راجا یَیاتی پر وارد ہوا تھا؛ اور حد سے بڑھی ہوئی ضد اور ہٹ دھرمی کے باعث مہارشی گالَو کو بھی بڑا کرب سہنا پڑا تھا۔
नारद उवाच