
Adhyāya 6: Vidura’s Saṃsāra-Upamā (The Allegory of the Well, Time, and Desire)
Upa-parva: Vidura–Dhṛtarāṣṭra Saṃsāra-Upamā (Allegory of Saṃsāra) Sub-episode
Dhṛtarāṣṭra opens with a sequence of inquiries framed as compassion: he asks how a person can dwell in harsh conditions, where that perilous ‘dharma-crisis’ place is, and how one might be freed from a great fear. Vidura answers by citing an instructive allegory used by mokṣa-knowers to secure a ‘good course’ beyond. He identifies the ‘wilderness/forest’ as the vast saṃsāra, with predators as diseases and a large-bodied woman as jarā (old age) that erodes beauty and form. The ‘well’ is the embodied condition (deha), with Kāla (Time) as the great serpent beneath—Antaka, the universal taker. The vine on which the human hangs is the hope of continued life; the elephant with six faces is the year, mapped through seasons and months, while the gnawing mice are day and night consuming life. Bees and honey-streams signify desires and their tastes in which humans sink. The chapter concludes: those who understand the turning of the saṃsāra-wheel cut its bonds—knowledge functioning as liberation-oriented agency.
Chapter Arc: धृतराष्ट्र, शोक से व्याकुल, विदुर के ‘संसार-वन’ रूपक को सुनकर चकित होकर पूछते हैं—ऐसा घोर दुःख सहकर भी वह जीव वहाँ कैसे रमता है, और वह देश कहाँ है जहाँ वह धर्मसंकट में फँसा रहता है। → राजा बार-बार उस ‘फँसे हुए ब्राह्मण/जीव’ के उद्धार का उपाय पूछते हैं; करुणा जागती है—‘सब बताओ, हम उसे निकालने का यत्न करेंगे।’ विदुर रूपक के प्रत्येक घटक का अर्थ खोलते जाते हैं, और श्रोता को धीरे-धीरे बोध होता है कि यह कथा किसी दूर देश की नहीं, अपने ही अस्तित्व की है। → विदुर निर्णायक व्याख्या करते हैं: ‘कूप’ देह है; भीतर का महान नाग ‘काल’ है; वृक्ष के पास घूमता षड्वक्त्र कुंजर ‘संवत्सर’ है—उसके छह मुख ऋतुएँ, बारह पाँव महीने; चूहे समय/दिन-रात की क्षय-शक्ति हैं; और सीमा पर खड़ी विशाल नारी ‘जरा’ है जो रूप-वर्ण का विनाश करती है। इस क्षण रूपक का पर्दा हटता है—संसारचक्र का भय और उसकी अनिवार्य गति प्रत्यक्ष हो जाती है। → विदुर बताते हैं कि बुद्धिमान पुरुष इस संसारचक्र की परिक्रमा को जानकर उसके पाश काटते हैं—अर्थात् देह-काल-जरामय बंधन को पहचानकर वैराग्य, विवेक और मोक्षमार्ग की ओर मुड़ते हैं। धृतराष्ट्र का शोक ‘व्यक्ति-हानि’ से उठकर ‘तत्त्व-बोध’ की दिशा में रूपांतरित होने लगता है। → धृतराष्ट्र के भीतर उठता अगला प्रश्न—‘यदि यह सब देह-काल का जाल है, तो शोक का वास्तविक उपचार और मोक्ष का सीधा साधन क्या है?’
Verse 1
अफ्-४#-राज षष्ठो& ध्याय: संसाररूपी वनके रूपकका स्पष्टीकरण ध्ृतराष्ट्र ववाच अहो खलु महद् दु:खं कृच्छुवासश्न॒ तस्य ह | कथं तस्य रतिस्तत्र तुष्टिवां वदतां वर
دھرتراشٹر نے کہا—اے گفتار کے سب سے برتر ودُر! یہ تو واقعی بڑی حیرت کی بات ہے۔ اس برہمن کو سخت عظیم دکھ پہنچا تھا اور وہ بڑی مشقت سے وہاں رہتا تھا؛ پھر بھی اس جگہ اس کا دل کیسے لگتا تھا اور اسے وہاں قناعت کیسے حاصل ہوتی تھی؟
Verse 2
स देश: क्व नु यत्रासौ वसते धर्मसंकटे । कथं वा स विमुच्येत नरस्तस्मान्महाभयात्,कहाँ है वह देश, जहाँ बेचारा ब्राह्मण ऐसे धर्मसंकटमें रहता है? उस महान् भयसे उसका छुटकारा किस प्रकार हो सकता है?
ودُر نے کہا—وہ کون سا دیس ہے جہاں وہ شخص دھرم کے سخت مخمصے میں پھنسا رہتا ہے؟ اور اس عظیم خوف سے وہ کس طرح نجات پا سکتا ہے؟
Verse 3
एतनमे सर्वमाचक्ष्व साधु चेष्टामहे तदा । कृपा मे महती जाता तस्याभ्युद्धरणेन हि,यह सब मुझे बताओ; फिर हम सब लोग उसे वहाँसे निकालनेकी पूरी चेष्टा करेंगे। उसके उद्धारके लिये मुझे बड़ी दया आ रही है
ودُر نے کہا—یہ سب کچھ مجھے صاف صاف بتاؤ؛ پھر ہم سب مناسب طور پر فوراً اسے وہاں سے نکال لانے کی پوری کوشش کریں گے۔ بے شک اس کی نجات کے لیے میرے دل میں بڑی شفقت جاگ اٹھی ہے۔
Verse 4
विदुर उवाच उपमानमिदं राजन् मोक्षविद्धिरुदाह्तम् । सुकृतं विन्दते येन परलोकेषु मानव:
ودُر نے کہا—اے راجن! یہ مثال موکش کے طریقے کو سمجھانے کے لیے بیان کی گئی ہے۔ اس پر چلنے سے انسان پرلوک میں نیکی (پُنّیہ) کا پھل پاتا ہے۔
Verse 5
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत स्त्रीपर्वके अन्तर्गत जलप्रदानिकपर्वमें धृतराष्ट्रके शीकका निवारणविषयक पाँचवाँ अध्याय पूरा हुआ,विदुरजीने कहा--राजन! मोक्षतत्त्वके विद्वानोंद्वारा बताया गया यह एक दृष्टान्त है, जिसे समझकर वैराग्य धारण करनेसे मनुष्य परलोकमें पुण्यका फल पाता है ।।
ودُر نے کہا—اے راجن! موکش کے تَتْو کو جاننے والے داناؤں نے اسے ایک دِرِشتانت (مثال) کے طور پر بتایا ہے۔ اسے سمجھ کر ویرाग (دل بیزاری) اختیار کرنے سے انسان پرلوک میں پُنّیہ کا پھل پاتا ہے۔ جسے ‘کَانتار’ کہا گیا ہے وہ یہی مہا سنسار ہے؛ اور جسے ‘دُرگم وَن’ کہا گیا ہے وہ سنسار ہی کی گھنی، فریب انگیز گہناہٹ ہے۔
Verse 6
ये च ते कथिता व्याला व्याधयस्ते प्रकीर्तिता: । या सा नारी बृहत्काया अध्यतिष्ठत तत्र वै,इति श्रीमहाभारते स्त्रीपर्वणि जलप्रदानिकपर्वणि धृतराष्ट्रविशोककरणे षष्ठो5ध्याय:
ودُر نے کہا—اور جو خوفناک سانپ جیسے عوارض تمہیں بتائے گئے تھے، وہی بیماریاں یہاں صاف طور پر گنوا دی گئی ہیں۔ وہ عظیم الجثہ عورت بھی وہیں موجود تھی۔ یوں مہابھارت کے استری پرب کے جل پرادانک پرب میں دھرتراشٹر کے شوق-نِوارن کے بیان کا چھٹا ادھیائے ختم ہوا۔
Verse 7
यस्तत्र कूपो नृपते स तु देह: शरीरिणाम्
ودُر نے کہا—اے نرَیشور! اس جنگل میں جسے ‘کنواں’ کہا گیا ہے، وہ دراصل جانداروں کا جسم ہے۔
Verse 8
यस्तत्र वसते5धस्तान्महाहि: काल एव सः | अन्तक: सर्वभूतानां देहिनां सर्वहार्यसौ
ودُر نے کہا—اس کے نیچے جو مہا سانپ بستا ہے، وہی کال (زمانہ/موت) ہے۔ اے نرَیشور! وہی تمام بھوتوں کا انتک ہے اور دےہ داروں کا سب کچھ چھین لینے والا۔
Verse 9
कूपमध्ये च या जाता वल्ली यत्र स मानव: । प्रताने लम्बते लग्नो जीविताशा शरीरिणाम्,कुँएके मध्यभागमें जो लता उत्पन्न हुई बतायी गयी है, जिसको पकड़कर वह मनुष्य लटक रहा है, वह देहधारियोंके जीवनकी आशा ही है
کنویں کے بیچ میں جو بیل اُگی ہے، جس کی پھیلی ہوئی شاخ کو پکڑ کر وہ انسان لٹکا ہوا ہے—وہی جسم رکھنے والوں کے لیے زندگی کے قائم رہنے کی امید ہے۔
Verse 10
स यस्तु कूपवीनाहे तं॑ वृक्ष परिसर्पति । षड्वक्त्र: कुज्जरो राजन् स तु संवत्सर: स्मृत:,राजन! जो कुएँके मुखबन्धके समीप छ: मुखों-वाला हाथी उस वृक्षकी ओर बढ़ रहा है, उसे संवत्सर माना गया है
اے راجن! کنویں کے دہانے کے قریب جو چھ مُنہ والا ہاتھی اس درخت کی طرف بڑھ رہا ہے—وہی ‘سموتسر’ (سال) سمجھا گیا ہے۔
Verse 11
मुखानि ऋतवो मासा: पादा द्वादश कीर्तिता: । ये तु वृक्ष निकृन््तन्ति मूषिका: सततोत्थिता:
اس کے مُنہ رُتیں ہیں؛ اس کے بارہ پاؤں مہینے کہے گئے ہیں۔ اور جو چوہے برابر اُبھرتے رہتے ہیں، وہ اس درخت کو کترتے اور کاٹتے رہتے ہیں۔
Verse 12
ये ते मधुकरास्तत्र कामास्ते परिकीर्तिता:,और जो-जो वहाँ मधुमक्खियाँ कही गयी हैं, वे सब कामनाएँ हैं। जो बहुत-सी धाराएँ मधुके झरने झरती रहती हैं, उन्हें कामरस जानना चाहिये, जहाँ सभी मानव डूब जाते हैं
اور وہاں جنہیں ‘مَधُکر’ (شہد کی مکھیاں) کہا گیا ہے، وہ دراصل خواہشات ہی بیان کی گئی ہیں۔
Verse 13
यास्तु ता बहुशो धारा: स्रवन्ति मधुनिस्रवम् । तांस्तु कामरसान् विद्याद् यत्र मज्जन्ति मानवा:
اور جو بہت سی دھارائیں شہد کے رس کی طرح لگاتار ٹپکتی رہتی ہیں، انہیں ‘کام-رس’ سمجھنا چاہیے—جہاں انسان ڈوب جاتے ہیں۔
Verse 14
एवं संसारचक्रस्य परिवृत्तिं विदुर्बुधा: । येन संसारचक्रस्य पाशांश्छिन्दन्ति वै बुधा:
یوں دانا لوگ سنسار کے چکر کی گردش کو سمجھتے ہیں؛ اور اس کی راہ جان کر ویراغیہ (بےرغبتی) کے ہتھیار سے اس چکر کے بندھن کے پھندے کاٹ ڈالتے ہیں۔
Verse 66
तामाहुस्तु जरां प्राज्ञा रूपवर्णविनाशिनीम् । जो सर्प कहे गये हैं
اس تمثیلی جنگل کی سرحد پر کھڑی وہ بلند قامت عورت—داناؤں کے نزدیک ‘جَرا’ ہے، یعنی بڑھاپا، جو صورت و رنگت کو مٹا دینے والا ہے۔
Verse 116
रात्यहानि तु तान्याहुर्भूतानां परिचिन्तका: । छः: ऋतुएँ ही उसके छः मुख हैं और बारह महीने ही बारह पैर बताये गये हैं। जो चूहे सदा उद्यत रहकर उस वृक्षको काटते हैं
اہلِ فکر کہتے ہیں کہ جو دو چوہے ہمیشہ چوکنے ہو کر اس درخت کو کترتے رہتے ہیں، وہ مخلوقات کے ‘دن’ اور ‘رات’ ہیں۔
Dhṛtarāṣṭra’s concern frames the dilemma as how a person can live amid ‘dharma-crisis’ and great fear; Vidura reframes it as the universal predicament of embodied life—how to respond ethically and intelligently to aging, disease, desire, and mortality.
Recognizing the mechanics of saṃsāra—time’s consuming force, the body’s vulnerability, and desire’s intoxicating pull—enables discernment and loosens attachment; knowledge is presented as the means to cut the bonds of cyclic entanglement.
Yes, implicitly: Vidura states that those who know the ‘turning’ of the saṃsāra-wheel cut its snares, indicating a soteriological benefit—understanding this teaching supports liberation-oriented clarity rather than merely narrative information.
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