राजवृत्त-रक्षा-प्रणिधि-षाड्गुण्योपदेशः
Royal Conduct, Protection, Intelligence, and Policy Measures
अमित तेजस्वी कोसलनरेशके इस प्रकार प्रश्न करनेपर महाज्ञानी बृहस्पतिजीने शान्तभावसे राजाके सत्कारकी आवश्यकता बताते हुए इस प्रकार उत्तर देना आरम्भ किया ।। ब॒हस्पतिर्वाच राजमूलो महाप्राज्ञ धर्मों लोकस्य लक्ष्यते प्रजा राजभयादेव न खादन्ति परस्परम्,बृहस्पतिजीने कहा--महाप्राज्ञ! लोकमें जो धर्म देखा जाता है, उसका मूल कारण राजा ही है। राजाके भयसे ही प्रजा एक-दूसरेको हड़प नहीं लेती है
bṛhaspatir uvāca | rāja-mūlo mahāprājña dharmo lokasya lakṣyate | prajā rāja-bhayād eva na khādanti parasparam ||
برہسپتی نے کہا—اے نہایت دانا! دنیا میں جو دھرم کارفرما دکھائی دیتا ہے، اس کی جڑ بادشاہ ہی ہے۔ بادشاہ کے خوف ہی سے رعایا ایک دوسرے کو نہیں کھا جاتی۔
वसुमना उवाच