यथा खदिरमालम्ब्य शिलां वाप्यर्णवं तरन् मज्जेत मज्जतस्तद्वद् दाता यश्च प्रतिग्रही,“जैसे खैरकी लकड़ी या पत्थरकी शिलाका सहारा लेकर समुद्र पार करनेवाला मनुष्य बीचमें ही डूब जाता है, उसी प्रकार अविधिपूर्वक दान देने और लेनेवाले यजमान और पुरोहित दोनों डूब जाते हैं
جیسے کھدیر کی لکڑی یا پتھر کی سل کو سہارا بنا کر سمندر پار کرنے والا آدمی بیچ ہی میں ڈوب جاتا ہے، اسی طرح جو داتا بے قاعدہ طریقے سے دان دے اور جو گیرندہ بے قاعدہ طریقے سے قبول کرے—دونوں ڈوب جاتے ہیں۔
व्यास उवाच