Nāgendra–Brāhmaṇa Saṃvāda: Praśna-vidhi and Dharmic Approach on the Gomatī Riverbank
वेदांस्तांश्षानयेन्नष्टान् कस्य चाहं प्रियो भवे | मैं वेदोंके बिना संसारकी उत्तम सृष्टि कैसे कर सकता हूँ? अहो! आज वेदोंके नष्ट होनेसे मुझपर बड़ा भारी दुःख आ पड़ा है, जो मेरे शोकमग्न हृदयको दुःसह पीड़ा दे रहा है। आज शोकके समुद्रमें डूबे हुए मुझ असहायका यहाँसे कौन उद्धार करेगा? उन नष्ट हुए वेदोंको कौन लायेगा? मैं किसको इतना प्रिय हूँ, जो मेरी ऐसी सहायता करेगा? ।। ३४-३५ कल इत्येवं भाषमाणस्य ब्रह्मणो नृपसत्तम,नृपश्रेष्ठट ऐसी बातें कहते हुए ब्रह्माजीके मनमें भगवान् श्रीहरिकी स्तुति करनेका विचार उत्पन्न हुआ। बुद्धिमानोंमें अग्रगण्य नरेश! तब भगवान् ब्रह्माने हाथ जोड़कर उत्तम एवं जपने योग्य स्तोत्रका गान आरम्भ किया
vaiśaṃpāyana uvāca | vedāṃs tān kṣāṇayen naṣṭān kasya cāhaṃ priyo bhave |
وہ ناپید ہو چکے وید کون واپس لائے گا؟ اور میں کس کا اتنا عزیز ہوں کہ وہ میری مدد کو آئے؟ اے نیک ترین بادشاہ! یوں کہتے کہتے برہما کے دل میں شری ہری کی ثنا کا خیال پیدا ہوا۔ پھر لوک پِتامہ برہما نے ہاتھ باندھ کر جپ کے لائق ایک بہترین ستوتر کا گان شروع کیا۔
वैशग्पायन उवाच