Atithi-satkāra and the Consolation of Wise Counsel (अतिथिसत्कारः प्रज्ञानवचनस्य च पराश्वासनम्)
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें नारययणकी महिमाविषयक तीन सौ बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३४२ ॥। (दक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं) 3: अ--छकऋा - सूर्य और चन्द्रमा ही अग्नि एवं सोम है। वे जगत्को हर्ष प्रदान करनेके कारण 'हृषी” कहलाते हैं। वे ही भगवानके केश अर्थात् किरणें हैं, इसलिये भगवान्का नाम “हृषीकेश' है। - “कृष्ण” नामकी दूसरी व्युत्पत्ति भी इस प्रकार है--कृष् नाम है सतूका और ण कहते हैं आनन्दको। इन दोनोंसे उपलक्षित सच्चिदानन्दघन श्यामसुन्दर गोलोकविहारी नन्दनन्दन श्रीकृष्ण कहलाते हैं। - वेदमन्त्रके दो-दो पदका उच्चारण करके पहले-पहलेको छोड़ते जाना और उत्तरोत्तर पदको मिलाकर दो-दो पदोंका एक साथ पाठ करते रहना क्रमविभाग कहलाता है। जैसे--“अग्निमीले पुरोहितम” इस मन्त्रका क्रमपाठ इस प्रकार है --“अग्नि मीले ईले पुरोहित पुरोहितं यज्ञस्य” इत्यादि। अक्षरविभागका अर्थ है पदविभाग--एक-एक पदको अलग-अलग करके पढ़ना। यथा “अग्निम् ईले पुरोहितम” इत्यादि। त्रिचत्वारिशरदाधिकत्रिशततमो< ध्याय: जनमेजयका प्रश्न, देवर्षि नारदका श्वेतद्वीपसे लौटकर नर- नारायणके पास जाना और उनके पूछनेपर उनसे वहाँके महत्त्वपूर्ण दृश्यका वर्णन करना शौनक उवाच सौते सुमहदाख्यानं भवता परिकीर्तितम् । यच्छुत्वा मुनय: सर्वे विस्मयं परमं गताः
śaunaka uvāca | saute sumahad ākhyānaṃ bhavatā parikīrtitam | yac chrutvā munayaḥ sarve vismayaṃ paramaṃ gatāḥ ||
شَونک نے کہا— “اے سَوتی! تم نے نہایت عظیم حکایت بیان کی ہے۔ اسے سن کر سبھی منی اعلیٰ ترین حیرت میں ڈوب گئے ہیں۔”
शौनक उवाच
The verse highlights the power of sacred narration (ākhyāna): when truth-bearing accounts are properly recounted, they awaken reverent awe in qualified listeners, preparing the mind for dharmic and devotional understanding.
Śaunaka addresses Sauti after hearing a major episode and remarks that all the assembled sages were struck with profound amazement, signaling a transition into further questioning and continuation of the account.