धर्मद्वारबहुत्वविमर्शः — Reflection on the Many ‘Doors’ of Dharma (Śānti-parva 342)
ततः स ब्रह्मणः पुत्र आद्यो हषिवरस्त्रित: । उत्ततारोदपानाद् वै पृश्चिगर्भानुकीर्तनात्,जब त्रितमुनि अपने भाइयोंद्वारा कुएँमें गिरा दिये गये, उस समय ऋषियोंने मुझसे इस प्रकार प्रार्थना की--'पृश्चिगर्भ! आप एकत और द्वितके गिराये हुए त्रितको डूबनेसे बचाइये।” उस समय मेरे पृश्चिगर्भ नामका बारंबार कीर्तन करनेसे ब्रह्माजीके आदि पुत्र ऋषिप्रवर त्रित उस कुएँसे बाहर हो गये
tataḥ sa brahmaṇaḥ putra ādyarṣivaras tritaḥ | uttatāra udapānād vai pṛśnigarbha-anukīrtanāt ||
تب برہما کا اوّلین فرزند، برگزیدہ رشی تریت—میرے نام ‘پرشچی گربھ’ کے بار بار کیرتن کے سبب—واقعی اس کنویں سے باہر نکل آیا۔
अर्जुन उवाच