Atithi-prāpti and the Brāhmaṇa’s Deliberation on Triadic Dharma (अतिथिप्राप्तिः धर्मत्रयविचारश्च)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५६३ श्लोक मिलाकर कुल १५६३ श्लोक हैं) ४-23 ह््य हि की चत्वारिशर्दाधिकत्रिशततमो< ध्याय: व्यासजीका अपने शिष्योंको भगवानद्ारा ब्रह्मादि देवताओंसे कहे हुए प्रवृत्ति और निवृत्तिरूप धर्मके शका रहस्य बताना शौनक उवाच कथं स भगवान् देवो यज्ञेष्वग्रहर: प्रभु: । यज्ञधारी च सततं वेदवेदाड़वित् तथा,शौनकजीने कहा--सूतनन्दन! वे प्रभावशाली वेदवेद्य भगवान् नारायणदेव यज्ञोंमें प्रथम भाग ग्रहण करनेवाले माने गये हैं तथा वे ही वेदों और वेदांगोंके ज्ञाता परमेश्वर नित्य- निरन्तर यज्ञधारी (यज्ञकर्ता) भी बताये गये हैं। एक ही भगवानमें यज्ञोंके कर्तृत्व और भोक्तृत्व दोनों कैसे सम्भव होते हैं?
śaunaka uvāca
kathaṃ sa bhagavān devo yajñeṣv agraharaḥ prabhuḥ |
yajñadhārī ca satataṃ vedavedāṅgavit tathā ||
شَونک نے کہا—اے سوت نندن! وہ ویدوں سے جانے جانے والے باجلال بھگوان نارائن یگیوں میں اوّلین حصہ لینے والے مانے گئے ہیں؛ اور وہی نِتّ یَجْن دھاری، وید اور ویدانگوں کے جاننے والے پرمیشور بھی کہے گئے ہیں۔ ایک ہی پرماتما میں یَجْن کا کرتّا ہونا اور یَجْن کا بھوکتا ہونا—دونوں کیسے ممکن ہیں؟
शौनक उवाच