निरपेक्ष: शुको भूत्वा नि:स्नेहो मुक्तसंशय: । मोक्षमेवानुसंचिन्त्य गमनाय मनो दथे,परंतु शुकदेवजी स्नेहका बन्धन तोड़कर निरपेक्ष हो गये थे। तत्त्वके विषयमें उन्हें कोई संशय नहीं रह गया था; अतः बारंबार मोक्षका ही चिन्तन करते हुए उन्होंने वहाँसे जानेका ही विचार किया
لیکن شُک دیو نے محبت کے بندھن توڑ کر بے نیاز ی اختیار کر لی تھی۔ حقیقت کے باب میں اس کے دل میں کوئی شک باقی نہ رہا؛ اس لیے وہ بار بار موکش ہی کا دھیان کرتے ہوئے وہاں سے روانہ ہونے کا ارادہ کرنے لگا۔
नारद उवाच