सौकुमार्य तथा रूपं वपुरग्म्रं तथा वयः । तवैतानि समस्तानि नियमश्षेति संशय:,सुकुमारता, सौन्दर्य, मनोहर शरीर तथा यौवनावस्था--ये सारी वस्तुएँ योगके विरुद्ध हैं; फिर भी आपमें इन सब गुणोंके साथ-साथ योग और नियम भी हैं ही, यह कैसे सम्भव हुआ? यही मेरे मनमें संदेह है
نازکی، حسن، دلکش بدن اور جوانی—یہ سب تو یوگ کے قواعد کے خلاف معلوم ہوتے ہیں۔ پھر بھی ان سب کے ہوتے ہوئے تم میں یوگ اور ضبطِ نفس کی تکمیل کیسے ممکن ہوئی؟ یہی میرے دل کا شبہ ہے۔
जनक उवाच