Śuka’s Guṇa-Transcendence and Vyāsa’s Consolation (शुकगति-वर्णनम्)
परतन्त्र: सदा राजा स्वल्पेष्वपि प्रसज्जते । संधिविग्रहयोगे च कुतो राज्ञ: स्वतन्त्रता,इसी प्रकार उपभोग, भोजन, आच्छादन तथा अन्यान्य परिमित विषयोंके सेवनमें और दुष्टोंके दमन एवं शिष्ट पुरुषोंके प्रति अनुग्रहके विषयमें भी राजा सदा ही परतन्त्र है। इसी प्रकार वह बहुत थोड़े कार्योंमें भी स्वतन्त्र नहीं है तो भी उनमें आसक्त रहता है। संधि और विग्रह करनेमें भी राजाको कहाँ स्वतन्त्रता प्राप्त है?
paratantraḥ sadā rājā svalpeṣv api prasajjate | sandhi-vigraha-yoge ca kuto rājñaḥ svatantratā ||
بھیشم نے کہا—بادشاہ ہمیشہ دوسروں کا محتاج رہتا ہے، پھر بھی چھوٹی چھوٹی باتوں میں بھی دل لگا بیٹھتا ہے۔ صلح اور جنگ کے معاملے میں بھی بادشاہ کو کہاں آزادی حاصل ہے؟
भीष्य उवाच