शुकस्य मिथिलागमनम् (Śukasya Mithilāgamanam) — Śuka’s Journey to Mithilā and the Courtly Test
तमप्यनुपमात्मान विश्व शम्भु: प्रजापति: । अणिमा लघिमा प्राप्तिरीशानो ज्योतिरव्यय:,इसके बाद, जिनके सब ओर हाथ-पैर हैं, सब ओर नेत्र, मस्तक और मुख हैं, सब ओर कान हैं तथा जो जगत्में सबको व्याप्त करके स्थित हैं, जो सम्पूर्ण भूतोंके हृदयमें अंगुष्ठपर्वके बराबर आकार धारण करके विराजमान हैं, अणिमा, लघिमा और प्राप्ति आदि ऐश्वर्य जिनके अधीन हैं, जो सबके नियन्ता, ज्योति:स्वरूप, अविनाशी, कल्याणमय, प्रजाके स्वामी, अनन्त, महान् आत्मा और सर्वेश्वर हैं, वे परब्रह्म परमात्मा उस अनुपम विश्वरूप बुद्धितत््वको अपनेमें लीन कर लेते हैं
tam apy anupamātmānaṃ viśva-śambhuḥ prajāpatiḥ | aṇimā laghimā prāptir īśāno jyotir avyayaḥ ||
یاج्ञولکْیَ نے کہا— اس بے مثال آتما کو بھی وِشو-شمبھُو پرجاپتی— ایشان، اَویَیَ جیوति— جس کے اختیار میں اَṇِما، لَघِما، پرَاپتی وغیرہ کی سِدھّیاں ہیں— اپنے اندر لَی کر لیتا ہے۔
याज़्वल्क्य उवाच