Jarā-Mṛtyu-anatikrama: Janaka–Pañcaśikha-saṃvāda
Aging and Death Cannot Be Overstepped
अव्यक्तस्य पर प्राहुर्विद्यां वै पडचविंशकम् । सर्वस्य सर्वमित्युक्तं ज्ञेयं ज्ञानस्य पार्थिव,पचीसवें तत्त्वके रूपमें जिस परम पुरुष परमात्माकी चर्चा की गयी है, उसीको अव्यक्त प्रकृतिकी परम विद्या बताया गया है। राजन! वही सम्पूर्ण ज्ञानका सर्वरूप ज्ञेय है
اَویَکت کی پرم ودیا ‘پنچوِمشک’—یعنی پچیسواں تتو، پرم پُرش—کہی گئی ہے۔ اے راجن! اسی کو ‘سب کا سب’ کہا گیا ہے؛ وہی تمام گیان کا پرم جْنیَے ہے۔
वसिष्ठ उवाच