क्षेत्र जानाति चाव्यक्तं क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते । आव्यक्तिके पुरे शेते पुरुषश्वेति कथ्यते,वह अव्यक्तसंज्ञक क्षेत्र (प्रकृति) को जानता है, इसलिये क्षेत्रज्ष कहलाता है और प्राकृत शरीररूपी पुरोंमें अन्तर्यामीरूपसे शयन करनेके कारण उसे “पुरुष' कहते हैं
وہ اَویَکت نامی کْشےتر (پرکرتی) کو جانتا ہے، اس لیے ‘کْشےترجْञ’ کہلاتا ہے؛ اور اَویَکت سے بنے ہوئے پرَاکرت جسم-روپ ‘پُر’ میں اندرونی حاکم (انترْیامی) کی حیثیت سے مقیم رہنے کے سبب اسے ‘پُرُش’ بھی کہا جاتا ہے۔
वसिष्ठ उवाच