तदेतच्छोतुमिच्छामि त्वत्त: कुरुकुलोद्वह | न तृप्यामीह राजेन्द्र शृण्वन्नमृतमीदृूशम्,अतः कुरुकुलधुरन्धर! राजेन्द्र! मैं आपहीके मुँहसे यह सब सुनना चाहता हूँ। आपके इन अमृतमय वचनोंको सुनकर मुझे तृप्ति नहीं होती है (अतएव आप मुझे यह क्षर- अक्षरका विषय बताइये।)
پس اے کوروکُل کے سرفراز، اے راجَیندر! میں یہ سب کچھ آپ ہی کے دہنِ مبارک سے سننا چاہتا ہوں۔ آپ کے ایسے آبِ حیات جیسے کلمات سن کر بھی مجھے سیری نہیں ہوتی۔
युधिछिर उवाच