Adhyāya 283: Varṇa-vṛtti, Nyāya-ārjana, and the Decline-and-Restoration of Dharma (वर्णवृत्तिः न्यायार्जनं च)
(महामुनि दधीचि भी उस यज्ञमण्डपमें उपस्थित थे। उन्होंने देखा कि देवता और दानव आदिका समाज तो खूब जुटा हुआ है; परंतु भगवान् शंकर दिखायी नहीं देते हैं। जान पड़ता है उनका आवाहन नहीं किया गया है। इससे उनके मनमें बड़ा दुःख हुआ।) उन सब देवताओंको वहाँ उपस्थित देख दधीचि क्रोधमें भर गये और बोले--'सज्जनो! जिसमें भगवान् शिवकी पूजा नहीं होती है, वह न यज्ञ है और न धर्म। यह यज्ञ भी भगवान् शिवके बिना यज्ञ कहनेयोग्य नहीं रहा। इसका आयोजन करनेवाले लोग वध और बन्धनकी किंनु मोहान्न पश्यन्ति विनाशं पर्युपस्थितम् । उपस्थित महाघोरं न बुध्यन्ति महाध्वरे,“इस महायज्ञमें अत्यन्त घोर विनाश उपस्थित होनेवाला है; किंतु मोहवश कोई देख नहीं रहे हैं-- समझ नहीं पाते हैं!
mohān na paśyanti vināśaṃ paryupasthitam | upasthitaṃ mahāghoraṃ na budhyante mahādhvare ||
وہ فریبِ وہم میں اندھے ہو کر قریب آتی ہوئی ہلاکت کو نہیں دیکھتے۔ اس مہایَجْن میں نہایت ہولناک آفت سر پر کھڑی ہے، مگر وہ اسے سمجھ نہیں پاتے۔
वैशम्पायन उवाच