राजधर्मः—राष्ट्ररक्षणं, दण्डनीतिः, हयग्रीवोपाख्यानम्
Royal Duty: Protection, Penal Policy, and the Hayagrīva Exemplum
सुखान्तप्रभवं दुःखं दुःखान्तप्रभवं सुखम् । “कभी दुःखके अन्तमें सुख और कभी सुखके अन्तमें दुःख भी आता है; अतः जो नित्य सुखकी इच्छा रखता हो, वह इन दोनोंका परित्याग कर दे; क्योंकि दुःख सुखके अन्तमें अवश्यम्भावी है, वैसे ही सुख भी दुःखके अन्तमें अवश्यम्भावी है
سکھ کے انجام سے دکھ پیدا ہوتا ہے اور دکھ کے انجام سے سکھ۔ اس لیے جو دائمی سکھ چاہتا ہے وہ ان دونوں کو ترک کر دے؛ کیونکہ جیسے سکھ کے آخر میں دکھ لازمی ہے، ویسے ہی دکھ کے آخر میں سکھ بھی لازمی ہے۔
व्यास उवाच