Adhyāya 249 — Mṛtyu-prādurbhāvaḥ (The Manifestation of Death) / Restraint of Tejas and Ordered Saṃhāra
संसारसागरगमां योनिपातालदुस्तराम् | आत्मकर्मोद्धवां तात जिद्नावर्ता दुरासदाम्,यह संसार एक भयंकर नदी है, जो सम्पूर्ण लोकमें प्रवाहित हो रही है। इसके स्रोत सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर बहते हैं। पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ इसके भीतर पाँच ग्राहोंके समान हैं। मनके संकल्प ही इसके किनारे हैं। लोभ और मोहरूपी घास और सेवारसे यह ढकी हुई है। काम और क्रोध इसमें सर्पके समान निवास करते हैं। सत्य इसका घाट है। मिथ्या इसकी हलचल है। क्रोध ही कीचड़ है। यह नदी दूसरी नदियोंसे श्रेष्ठ है। यह अव्यक्त प्रकृतिरूपी पर्वतसे प्रकट हुई है। इसके जलका वेग बड़ा प्रखर है। अजितात्मा पुरुषोंके लिये इसे पार करना अत्यन्त कठिन है। इसमें कामरूप ग्राह सब ओर भरे हैं। यह नदी संसार-सागरमें मिली है। वासनारूपी गहरे गड़ढोंके कारण इसे पार करना अन्यन्त कठिन है। तात! यह अपने कर्मोसे ही उत्पन्न हुई है। जिह्नला भवँर है तथा इस नदीको लाँघना दुष्कर है। तुम अपनी विशुद्ध बुद्धिके द्वारा इस नदीको पार कर जाओ
saṃsārasāgaragamāṃ yonipātāladustarām | ātmakarmoddhavāṃ tāta jihvāvartāṃ durāsadām ||
ویاس نے کہا—اے عزیز! یہ سنسار کی دھارا سنسار-ساگر میں جا ملتی ہے؛ اس کی گہرائیاں یونی اور پاتال کی مانند ہیں، اس لیے اسے پار کرنا نہایت دشوار ہے۔ یہ اپنے ہی اعمال سے پیدا ہوتی ہے؛ زبان (ذائقے کی طلب) اس کا بھنور ہے، اور اس کے قریب جانا بھی خطرناک۔ صرف پاکیزہ فہم اور نفس پر قابو سے ہی انسان اسے پار کر کے سلامتی کے کنارے پہنچتا ہے۔
व्यास उवाच