Gṛhastha-vṛtti and Niyama: Models of Householder Livelihood and Discipline (गृहस्थवृत्ति-नियमाः)
अधर्म धर्मकामो हि करोति हाविचक्षण: । धर्म वाधर्मसंकाशं शोचन्निव करोति सः,जो मूढ़ है, वह धर्मकी इच्छा रखकर भी अधर्म करता है अथवा शोकमग्न-सा होकर अधर्मतुल्य धर्मका सम्पादन करता है। मूर्ख या अविवेकी मनुष्य न जाननेके कारण “मैं धर्म कर रहा हूँ” ऐसा समझकर अधर्म करता है और अधर्मकी इच्छा रखकर धर्म करता है, इस प्रकार अज्ञानपूर्वक दोनों तरहके कर्म करनेवाला देहधारी मनुष्य बारंबार जन्म लेता और मरता है
adharma-dharma-kāmo hi karoti hāvicakṣaṇaḥ | dharma vādharmasaṅkāśaṃ śocann iva karoti saḥ ||
نادان و بےتمیز آدمی دھرم کی خواہش رکھتے ہوئے بھی اَدھرم کر بیٹھتا ہے؛ اور کبھی غم زدہ سا ہو کر ایسا عمل کرتا ہے جو دکھنے میں دھرم ہو، مگر حقیقت میں اَدھرم کے مانند ہو۔
व्यास उवाच