आत्मनि श्रेयसि ज्ञाने धीरं निश्चितनिश्चयम् । परावरज्ञं भूतानां सर्वज्ञं समदर्शनम्,प्रह्नादजीके मनमें किसी विषयके प्रति आसक्ति नहीं थी। उनके सारे पाप धुल गये थे। वे कुलीन और बहुश्रुत विद्वान् थे। वे गर्व और अहंकारसे रहित थे। वे धर्मकी मर्यादाके पालनमें तत्पर और शुद्ध सत्त्वगुणमें स्थित रहते थे। निन्दा और स्तुतिको समान समझते, मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखते और एकान्त स्थानमें निवास करते थे। उन्हें चराचर प्राणियोंकी उत्पत्ति और विनाशका ज्ञान था। अप्रियकी प्राप्तिमें क्रोधयुक्त तथा प्रियकी प्राप्ति होनेपर हर्षयुक्त नहीं होते थे। मिट्टीके ढेले और सुवर्ण दोनोंमें उनकी समानदृष्टि थी। वे ज्ञानस्वरूप कल्याणमय परमात्माके ध्यानमें स्थित और धीर थे। उन्हें परमात्मतत्त्वका पूर्ण निश्चय हो गया था। उन्हें परावरस्वरूप ब्रह्मका पूर्ण ज्ञान था। वे सर्वज्ञ, सम्पूर्णभूत- प्राणियोंमें समदर्शी एवं जितेन्द्रिय थे। वे भगवान् नारायणके प्रिय भक्त और सदा उन्हींके चिन्तनमें तत्पर रहनेवाले थे। हिरण्यकशिपुनन्दन प्रह्नादजीको एकान्तमें बैठकर परमात्मा श्रीहरिका ध्यान करते देख इन्द्र उनकी बुद्धि और विचारको जाननेकी इच्छासे उनके निकट जाकर इस प्रकार बोले--
bhīṣma uvāca |
ātmani śreyasi jñāne dhīraṃ niścita-niścayam |
parāvara-jñaṃ bhūtānāṃ sarvajñaṃ sama-darśanam ||
بھیشم نے کہا—وہ ثابت قدم تھا؛ آتما کے اُس علم میں قائم تھا جو سب سے اعلیٰ خیر ہے، اور اس کا عزم پختہ و غیر متزلزل تھا۔ وہ اعلیٰ و ادنیٰ حقیقتوں کا جاننے والا تھا، مخلوقات کی پیدائش و فنا کو سمجھتا تھا، اصولاً ہمہ دانا تھا اور سب کو یکساں نظر سے دیکھتا تھا۔
भीष्म उवाच
The verse praises the ideal of a realized person: firmly established in Self-knowledge (the true good), possessing settled conviction, understanding both higher and lower realities, and maintaining equal vision toward all beings—an ethical-spiritual maturity marked by steadiness and impartiality.
Bhishma is describing the exalted spiritual state of Prahlada (as expanded in the surrounding prose): detached from sense-objects, free from pride, self-controlled, dwelling in solitude, and absorbed in meditation on the Supreme; this sets the stage for Indra approaching him to understand his mind and intention.