ध्यानयोगवर्णनम्
Description of the Path of Meditation
तथा शरीरसंत्यागे जीवो ह्याकाशवत् स्थित: । न गृहाते तु सूक्ष्मत्वाद् यथा ज्योतिर्न संशय:,उसी प्रकार शरीरको त्याग देनेपर जीव आकाशकी भाँति स्थित होता है। वह अत्यन्त सूक्ष्म होनेके कारण बुझी हुई आगके समान अनुभवमें नहीं आता, परंतु रहता अवश्य है; इसमें संशय नहीं है
اسی طرح جب جسم کا ترک ہوتا ہے تو جیو آکاش کی مانند قائم رہتا ہے۔ وہ نہایت لطیف ہونے کے سبب بجھی ہوئی آگ کی طرح احساس میں نہیں آتا؛ مگر وہ موجود رہتا ہے—اس میں کوئی شک نہیں۔
भरद्वाज उवाच