Adhyāya 180: Jīva, Śarīra, and the Fire Analogy (भृगु–भरद्वाज संवादः)
कणं कदाचित् खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे । भक्षये शालिमांसानि भक्षांश्नोच्चावचान् पुन:,“कभी चावलकी कनी खाता हूँ, कभी तिलकी खली ही खाकर रह जाता हूँ और कभी अगहनीके चावलका भात भरपेट खाता हूँ। इस प्रकार मुझे बढ़िया-घटिया सभी तरहके भोजन बारंबार प्राप्त होते रहते हैं
بھیشم نے کہا—“کبھی میں چاول کے دانے کھاتا ہوں، کبھی تل کی کھلی ہی میرا لقمہ بن جاتی ہے؛ اور کبھی شالی چاول اور گوشت وغیرہ جیسے عمدہ کھانے بھی کھاتا ہوں۔ یوں اچھا بُرا ہر طرح کا کھانا مجھے بار بار ملتا رہتا ہے۔”
भीष्म उवाच