प्रजाविसर्ग-तत्त्वनिर्णयः | Cosmogony of Elemental Emergence
Bharadvāja–Bhṛgu Dialogue
जबतक मनुष्य भोगोंसे तृप्त नहीं होता, संग्रह ही करता रहता है, तभीतक ही उसे मौत आकर ले जाती है। ठीक वैसे ही, जैसे व्याप्र किसी पशुको ले जाता है ।। इदं कृतमिदं कार्यमिदमन्यत् कृताकृतम् । एवमीहासुखासक्तं कृतान्त: कुरुते वशे,मनुष्य सोचता है कि यह काम पूरा हो गया, यह अभी करना है और यह अधूरा ही पड़ा है--इस प्रकार चेष्टाजनित सुखमें आसक्त हुए मानवको काल अपने वशमें कर लेता है
yāvat manuṣyo bhogaiḥ na tṛpyati saṅgraham eva karoti; tāvat eva taṃ mṛtyur āgatya nayati—yathā vyāghraḥ paśum ādāya nayet. idaṃ kṛtam idaṃ kāryam idam anyat kṛtākṛtam; evam īhā-sukhāsaktaṃ kṛtāntaḥ kurute vaśe.
بھیشم نے کہا—جب تک انسان لذتوں سے سیر نہیں ہوتا، وہ بس جمع ہی کرتا رہتا ہے؛ اور اسی جمع و جوڑ میں لگا ہوا ہوتا ہے کہ موت آ کر اسے اٹھا لے جاتی ہے—جیسے شیر کسی جانور کو اٹھا لے جائے۔ “یہ ہو گیا، یہ کرنا ہے، وہ آدھا ہوا-آدھا رہ گیا”—یوں سوچتے ہوئے، مسلسل جدوجہد سے پیدا ہونے والی خوشی سے چمٹا ہوا انسان کال (موت) کے قبضے میں آ جاتا ہے۔
भीष्म उवाच