असंतोषादिदोष-निरूपणम्
On the Faults of Discontent and the Discipline of Detachment
/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३० श्लोक हैं) अपन बछ। ] अत्ऑका:< सप्तदशो<् ध्याय: युधिष्ठिरद्वारा भीमकी बातका विरोध करते हुए मुनिवृत्तिकी और ज्ञानी महात्माओंकी प्रशंसा युधिछिर उवाच असंतोष: प्रमादश्ष मदो रागो5प्रशान्तता । बल॑ मोहो5भिमानश्षाप्युद्वेगश्वैव सर्वश:,युधिष्ठिर बोले--भीमसेन! असंतोष, प्रमाद, मद, राग, अशान्ति, बल, मोह, अभिमान तथा उद्वेग--ये सभी पाप तुम्हारे भीतर घुस गये हैं, इसीलिये तुम्हें राज्यकी इच्छा होती है। भाई! सकाम कर्म और बन्धनसे- रहित होकर सर्वथा मुक्त, शान्त एवं सुखी हो जाओ
yudhiṣṭhira uvāca | asaṃtoṣaḥ pramādaś ca mado rāgo 'praśāntatā | balaṃ moho 'bhimānaś cāpy udvegaś caiva sarvaśaḥ ||
یُدھِشٹھِر نے کہا—اے بھیمسین! بے اطمینانی، غفلت، غرورِ مستی، رغبت، بے سکونی، زورِ بازو، فریبِ نظر، خودپسندی اور اضطراب—یہ سب عیوب ہر سمت سے تمہارے اندر داخل ہو گئے ہیں۔ اسی لیے تمہارے دل میں سلطنت کی خواہش اٹھتی ہے۔
युधिछिर उवाच