अध्याय १५२: लोभः पापस्य मूलम् — Greed as the Root of Wrongdoing
ऑपन-- माल छा *्ःि ३. ये परिक्षित् और जनमेजय अर्जुनके पौत्र और प्रपौत्र नहीं हैं। एकपज्चाशर्दाधकशततमो< ध्याय: ब्रह्महत्याके अपराधी जनमेजयका इन्द्रोत मुनिकी शरणमें जाना और इन्द्रोत मुनिका उससे ब्राह्मुणद्रोह न करनेकी प्रतिज्ञा कराकर उसे शरण देना भीष्म उवाच एवमुक्त: प्रत्युवाच तं॑ मुनिं जनमेजय: । गा भवान् गर्हयते निन्द्य॑ निन्दति मां पुन:
bhīṣma uvāca | evam uktaḥ pratyuvāca taṁ muniṁ janamejayaḥ | kiṁ bhavān garhayate nindyaṁ nindati māṁ punaḥ ||
بھیشم نے کہا—یوں کہے جانے پر جنمیجیہ نے اس مُنی سے جواب دیا: “بھگون! آپ کس بات کی ملامت کرتے ہیں؟ آپ مجھے بار بار قابلِ مذمت امر پر کیوں سرزنش کرتے ہیں؟”
भीष्म उवाच