कपोत-लुब्धकसंवादः — Hunter’s Remorse and Renunciatory Resolve
नैवोग्रं नैव चानुग्रं धर्मेणेह प्रशस्यते । उभयं न व्यतिक्रामेदुग्रो भूत्वा मृदुर्भव,युधिष्ठिर! राजधर्मके अनुसार केवल उमग्रभाव अथवा केवल मृदुभावकी प्रशंसा नहीं की जाती है। उन दोनोंमेंसे किसीका भी परित्याग नहीं करना चाहिये। इसलिये तुम पहले उग्र होकर फिर मृदु होओ
اے یُدھشٹھِر! راج دھرم میں نہ صرف سختی کی تعریف ہے اور نہ صرف نرمی کی؛ یہاں دھرم کے مطابق دونوں ہی پسندیدہ ہیں۔ دونوں میں سے کسی کو بھی ترک نہ کرو؛ اس لیے پہلے سخت بنو، پھر نرم ہو جاؤ۔
भीष्म उवाच