धृतराष्ट्रविलापः — Dhṛtarāṣṭra’s Lament and Inquiry (Śalya-parva, Adhyāya 2)
सा कृपा सा च ते प्रीति: क्व सा राजन् सुमानिता । कथं विनिहतः पार्थ: संयुगेष्वपराजित:,राजन! तुम्हारी वह कृपा, वह प्रीति और दूसरोंको सम्मान देनेकी वह वृत्ति कहाँ चली गयी? तुम तो किसीसे परास्त होनेवाले नहीं थे; फिर कुन्तीके पुत्रोंके द्वारा युद्धमें कैसे मारे गये?
اے راجن! تیری وہ کرپا، وہ پریتی اور دوسروں کو عزت دینے کی وہ خو کہاں چلی گئی؟ تو تو کسی سے مغلوب ہونے والا نہ تھا؛ پھر کنتی کے پُتروں کے ہاتھوں جنگ میں کیسے مارا گیا؟
धघतयाट्र उवाच