चिरं हाापि जड: शूर: पण्डितं पर्युपास्य हि । न स धर्मान् विजानाति दर्वी सूपरसानिव,जिसकी बुद्धिपर जडता छा रही हो, वह शूरवीर योद्धा दीर्घकालतक विद्वानकी सेवामें रहनेपर भी धर्मोका रहस्य नहीं जान पाता। ठीक उसी तरह जैसे करछुल दालनमें डूबी रहनेपर भी उसके स्वादको नहीं जानती है
ciraṁ hāpi jaḍaḥ śūraḥ paṇḍitaṁ paryupāsya hi | na sa dharmān vijānāti darvī sūparasān iva ||
جس کی عقل پر جمود چھایا ہو، وہ بہادر بھی اگر مدتِ دراز تک عالم کی صحبت و خدمت میں رہے تب بھی دھرم کے اسرار نہیں جان پاتا—جیسے چمچہ شوربے میں ڈوبا رہے مگر اس کا ذائقہ نہ چکھے۔
कृप उवाच