अध्याय ६४ — सभामध्ये क्रोध-निवारणम्
Restraint of wrath in the royal assembly
आशीविषान् नेत्रविषान् कोपयेन्न च पण्डित: । एवं ते5हं वदामीदं प्रयतः कुरुनन्दन,कुरुनन्दन! मैं एकाग्र हृदयसे तुमसे यह बात बता रहा हूँ, 'विद्वान् पुरुष उन सर्पोंको कुपित न करें, जो दाँतों और नेत्रोंसे भी विष उगलते रहते हैं (अर्थात् ये पाण्डव तुम्हारे लिये सर्पोंसे भी अधिक भयंकर हैं, इन्हें मत छेड़ो)”
Āśīviṣān netraviṣān kopayen na ca paṇḍitaḥ | evaṁ te 'haṁ vadāmīdaṁ prayataḥ kurunandana ||
اے کُرونندن! میں یکسوئی کے ساتھ تم سے کہتا ہوں—دانش مند اُن سانپوں کو کبھی غضبناک نہیں کرتا جو دانتوں ہی سے نہیں، آنکھوں سے بھی زہر اُگلتے ہیں۔
विदुर उवाच