सभा-पर्व, अध्याय ६१ — द्रौपदी-प्रश्नः, सभाधर्मः, सत्यवचन-नियमः
एकैको ह्वात्र लभते सहस्रपरमां भृतिम् । युध्यतो<्युध्यतो वापि वेतनं मासकालिकम् । एतद् राजन् मम धन तेन दीव्याम्यहं त्वया,युधिष्ठिरने कहा--मेरे पास उतने ही अर्थात् एक हजार रथ हैं, जिनकी ध्वजाओंमें सोनेके डंडे लगे हैं। उन रथोंपर पताकाएँ फहराती रहती हैं। उनमें सधे हुए घोड़े जोते जाते हैं और विचित्र युद्ध करनेवाले रथी उनमें बैठते हैं। उन रथियोंमेंसे प्रत्येकको अधिक-से- अधिक एक सहस््र स्वर्णमुद्राएँतक वेतनमें मिलती हैं। वे युद्ध कर रहे हों या न कर रहे हों, प्रत्येक मासमें उन्हें यह वेतन प्राप्त होता रहता है। राजन! यह मेरा धन है, इसे दाँवपर लगाकर मैं तुम्हारे साथ खेलता हूँ
ekāiko hvātra labhate sahasra-paramāṁ bhṛtim | yudhyato 'yudhyato vāpi vetanaṁ māsa-kālikam | etad rājan mama dhanaṁ tena dīvyāmy ahaṁ tvayā |
یُدھِشٹھِر نے کہا—“یہاں ہر ایک کو زیادہ سے زیادہ ایک ہزار بھرتی (وظیفہ/تنخواہ) ملتی ہے۔ وہ لڑے یا نہ لڑے، ماہانہ اجرت دی جاتی ہے۔ اے راجن! یہ میرا مال ہے؛ اسی کو داؤ پر رکھ کر میں تمہارے ساتھ جُوا کھیلتا ہوں۔”
युधिछिर उवाच