कच्चित् सहसैमूर्खाणामेकं क्रीणासि पण्डितम् | पण्डितो हार्थकृच्छेषु कुर्यान्नि:श्रेयसं परम्,तुम हजारों मूर्खोके बदले एक पण्डितको ही तो खरीदते हो न? अर्थात् आदरपूर्वक स्वीकार करते हो न? क्योंकि विद्वान् पुरुष ही अर्थसंकटके समय महान् कल्याण कर सकता है
کیا تم ہزاروں نادانوں کے بدلے ایک ہی پنڈت کو عزت کے ساتھ قبول کرتے ہو؟ کیونکہ مالی تنگی کے وقت وہی دانا مرد اعلیٰ ترین بھلائی کا سبب بن سکتا ہے۔
नारद उवाच