Rājasūyābhiṣeka-darśana: Duryodhana’s Observation of the Consecration
(उपस्थित: सर्वकामैस्त्रिदिवे वासवो यथा । विविधैरन्नपानैश्व प्रवरैः कि नु शोचसि ।। जैसे स्वर्गमें इन्द्रको सम्पूर्ण मनोवांछित भोग सुलभ हैं, उसी प्रकार समस्त अभिलषित भोग और खाने-पीनेकी विविध उत्तम वस्तुएँ तुम्हारे लिये सदा प्रस्तुत हैं। फिर तुम किसलिये शोक करते हो? निरुक्त निगमं छन््द: सषडड्जार्थशास्त्रवान् | अधीत: कृतविद्यस्त्वमष्टव्याकरणै: कृपात् ।। तुमने कृपाचार्यसे निरुक्त, निगम, छन्द, वेदके छहों अंग, अर्थशास्त्र तथा आठ प्रकारके व्याकरणशास्त्रोंका अध्ययन किया है। हलायुधात् कृपाद् द्रोणादस्त्रविद्यामधीतवान् । प्रभुस्त्वं भुञ्जसे पुत्र संस्तुत: सूतमागधै: ।। तस्य ते विदितप्रज्ञ शोकमूलमिदं कथम् | लोकेडस्मिज्ज्येष्ठ भागी त्वं तन््ममाचक्ष्व पुत्रक ।। हलायुध, कृपाचार्य तथा द्रोणाचार्यसे तुमने अस्त्रविद्या सीखी है। बेटा! तुम इस राज्यके स्वामी होकर इच्छानुसार सब वस्तुओंका उपभोग करते हो। सूत और मागध सदा तुम्हारी स्तुति करते रहते हैं। तुम्हारी बुद्धिकी प्रखरता प्रसिद्ध है। तुम इस जगत्में ज्येष्ठ पुत्रके लिये सुलभ समस्त राजोचित सुखोंके भागी हो। फिर भी तुम्हें कैसे चिन्ता हो रही है? बेटा! तुम्हारे इस शोकका कारण क्या है? यह मुझे बताओ। वैशम्पायन उवाच तस्य तद् वचन श्रुत्वा मन्द: क्रोधवशानुग: । पितरं प्रत्युवाचेदं स्वमतिं सम्प्रकाशयन् ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--पिताका यह कथन सुनकर क्रोधके वशीभूत हुए मूढ़ दुर्योधनने उन्हें अपना विचार बताते हुए इस प्रकार उत्तर दिया। दुर्योधन उवाच अश्षाम्याच्छादये चाहं यथा कुपुरुषस्तथा । अमर्ष धारये चोग्र॑ निनीषु: कालपर्ययम्,दुर्योधन बोला--पिताजी! मैं अच्छा खाता-पहनता तो हूँ, परंतु कायरोंकी भाँति। मैं समयके परिवर्तनकी प्रतीक्षामें रहकर अपने हृदयमें भारी ईर्ष्या धारण करता हूँ
duryodhana uvāca |
aśnāmy ācchādaye cāhaṃ yathā kupuruṣas tathā |
amarṣaṃ dhāraye cograṃ ninīṣuḥ kālaparyayam ||
دُریودھن نے کہا—ابّا جان! میں کھاتا پیتا اور لباس پہنتا تو ہوں، مگر ایک کمینے کی طرح—بے حقیقی وقار کے۔ میں زمانے کے پلٹنے کی گھڑی کا منتظر ہوں اور اپنے اندر ایک تیز، دہکتی ہوئی حسد و کینہ لیے بیٹھا ہوں۔
दुर्योधन उवाच
Material comfort and public praise do not remove inner suffering when the mind is ruled by amarṣa—jealous resentment. The verse highlights an ethical warning: envy corrodes dignity from within, making a person feel ‘base’ even amid prosperity, and it drives one to wait for (or engineer) a ‘turn of time’ to harm rivals.
After being questioned about his sorrow despite having every royal luxury, Duryodhana admits to his father that his distress is not due to lack of pleasures but due to intense resentment. He confesses he is inwardly consumed, waiting for a change in circumstances—an early disclosure of the hostility that will later fuel the great conflict.