प्राच्छादयन् कर्णरथं क्षणेन युगान्तवहन्यर्ककरप्रकाशा: । भरतश्रेष्ठ अर्जुनके छोड़े हुए प्रलयकालीन सूर्य और अग्निकी किरणोंके समान प्रकाशित होनेवाले दस हजार बाणोंने क्षणभरमें कर्णके रथको आच्छादित कर दिया ।। ततश्न शूलानि परश्चधानि चक्राणि नाराचशतानि चैव
یُگانت کی آگ اور سورج کی کرنوں کی مانند درخشاں، بھرت شریشٹھ ارجن کے چھوڑے ہوئے دس ہزار تیروں نے پل بھر میں کرن کے رتھ کو ڈھانپ لیا۔ پھر نیزے، کلہاڑے، چکر اور سینکڑوں نارچ بھی ظاہر ہونے لگے۔
संजय उवाच