त॑ चायसं निशितं तीक्ष्णधारं विकोशमुग्रं गुरुभारसाहम् । द्विषच्छरीरान्तकरं सुघोर- माधुन्वत: सर्पमिवोग्ररूपम्,इसके बाद शत्रुओंका सामना करनेमें समर्थ वृषसेनने अत्यन्त वेगशाली और तीखी धारवाले छ: बाणोंद्वारा तलवार घुमाते हुए नकुलकी उस तलवारके भी शीघ्रतापूर्वक टुकड़े- टुकड़े कर डाले। वह तलवार लोहेकी बनी हुई, तेजधारवाली तीखी, भारी भार सहन करनेमें समर्थ, म्यानसे बाहर निकली हुई, भयंकर, सर्पके समान उग्र रूपधारी, अत्यन्त घोर और शत्रुओंके शरीरोंका अन्त कर देनेवाली थी। तलवार काटनेके पश्चात् उसने पुनः प्रज्वलित एवं पैने बाणोंद्वारा नकुलकी छातीमें गहरी चोट पहुँचायी
taṁ cāyasaṁ niśitaṁ tīkṣṇadhāraṁ vikośam ugraṁ gurubhārasāham | dviṣaccharīrāntakaraṁ sughoram ādhunvataḥ sarpam ivograrūpam ||
وہ تلوار لوہے کی تھی—نہایت تیز، باریک دھار والی، نیام سے نکلی ہوئی، ہیبت ناک، بھاری ضرب سہنے کے قابل؛ دشمنوں کے جسموں کا خاتمہ کرنے والی نہایت ہولناک؛ اور گھماتے وقت اژدہا صفت، غضبناک سانپ کی مانند خوف انگیز دکھائی دیتی تھی۔
संजय उवाच